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Wednesday, 21 March 2012

चुनाव का विश्लेषण:


इलेक्ट्रैनिक मिड़िया चुनाव विश्लेषण में जादा रस लेती है। प्रिंट मिड़िया को सीमायें होती है। मगर प्रिंट मिड़ियाँ जादा असरदार होती है। चित्र देखनेसे जल्दी समझ में आता है। मगर अख़बार हरएक अपने समय में पढ़ता है। समझ में नही आता तो दुबारा या अधिक बार पढ़ता है। ऐसा समझा जाता है कि, मिड़िया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है। इस का यह भी मतलब है कि मिड़ियाँ ने अपनी जिम्मेवारी समझ के काम करना चाहिये। मगर मिड़िया जो बिकता है वही प्रसिद्ध करता है। याने जनता को असलियत बताने के बज़ाय जनता कोे जो चाहिये वही दिख़ाता है। चुनाव विश्लेषण में यह बात सामने आती है। मिडिया समझती नही कि, विश्लेषण में धर्म और जाती का संबंध जोड़नेसे जनता में अलगाव पैदा होता है।
जनता ही क्या, राजनीति पक्ष भी यह समझते है कि, जाति धर्म के आधारपर वोट बटोर सकते है और चुनाव जीत सकते है। भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस उस के लिये सबसे ज़ादा जिम्मेवार है। यह भी देख़ा गया है की, चुनाव में वोट देनेवाले जादातर लोग शिक्षित नही होते। शिक्षित लोग तो चुनाव के दिन यात्रा पर जाते है। छुट्टी का सही इस्तेमाल नही करते। यही कारन होगा, जिस वज़हसे काँग्रेसने अनुसुचित जाति और जमाती की वोट बैंक बनाई। उस के बाद काँग्रेसने अल्पसंख्यांको को घेरे में लिया। यह कम पडते देख़ा तो पिछडी जातियों को घेरे में लिया। भारतीय ज़नता पक्ष भी पीछे नही है। उसने हिंदुओं की वोट बैंक बनाने की ठानी। भारतीय ज़नता पक्ष की दाद देनी होगी। पता नही इस पक्ष को कैसा भरोसा हुआ कि, अनुसुचित जाति /जमाती, अल्पसंख्यांक, पिछडी जातियाँ को अलग करने के बाद वोटिंग में हिस्सा लेने वाले कितने हिंदू बचते है। वैसे भी 5-10 प्रतिशत हिंदुओं को साथ लेने से चुनाव जीतने की आशा करना निरर्थक है यह कोई बच्चा भी बता सकता है। उस में ओर एक कड़ी है। यह 5-10 प्रतिशत हिंदू शायद ही वोटिंग करते है। राज़नीती पक्ष की यह सोच मिडियाने भी अपनायी। इस का मतलब यह हुआ की, भारत में लोकतंत्र नही धर्म और जाति तंत्र पनप रहा है। मिडिया यह सोच बदल सकती है। मिड़ियाने लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बनने के लिये यह करना ही चाहिये।
मिड़ियाने अपना काम चुनाव के पहलेसे चालू करना चाहिये। सर्वेक्षणसे पता लगाना चाहिये जनता क्या चाहती है। मिड़िया अपने तरफ़से यादी बनाकर वोटरों को पूछ सकती है कि, हरएक का अपना ख्याल क्या है। नीचे एक यादी दी है। उस में और मुद्दे डाल कर या कुछ मुद्दे निकाल कर अपनी यादी बना सकती है। उस पर मतदाताओं की सोच ले सकती है। यह बनाते समय एक चीज़ ध्यान में रखनी होगी कि, यादी में धर्म या ज़ाती का मुद्दा ना हो। इस सूची का आधार ले के वोटर अपनी सूची बना सकता है। नीचे दिया हुई तालिका प्रातिनिधिक है। उस में चुनाव के कई मुद्दे समाविष्ठ करने पडेंगे। राजनीति दल और भी हो सकते है। उन्हे ज़ोडना पडेगा। कुछ अपक्ष उम्मीदवार भी हो सकते है। उन के नाम भी सूची में होने चाहिये। मिडियाने ऐसी तालिका हर चुनावक्षेत्र के लिये बनवानी चाहिये और सर्वेक्षण करना चाहिये। ऐसे सर्वेक्षण का फ़ायदा जनता का मन जानने के लिये होगा। राजनीति दल और उम्मीदवार समझ सकेंगे जनता क्या चाहती है। हर राजनितीक दलने भी अपना उम्मीदवार मुक्करर करने के लिये इस मार्ग का अनुसरण करना चाहिये। सही उम्मीदवार चुनने में काफ़ी मदद मिलेगी और सही उम्मीदवार चुनाव में खड़ा कर सकेंगे। मिड़िया चुनाव के बाद भी यह सूची ले के सर्वेक्षण कर सकती है और चुनाव का नतीजा वोट गिनने के पहले बता सकती है। चुनाव के कौनसे मुद्दे जनता को प्रभावित कर सकते है या किया है यह भी सामने ला सकती है। इससे शासन को भी कौनसा काम प्रथम करना चाहिये इस का अंदाज़ा भी हो सकता है। हर एक मुद्दे के सामने हर एक राजनीति दल और उम्मीदवार को हाँ हो तो 1 गुण और ना हो तो शून्य गुण दे कर सब के अपने अपने कुल गुण आखरी खाने में जमा कर दे। जिसकी गुणों की संख्या अधिक वह चुनाव जीतने की संभावना अधिक। हर वोटर भी अपना अपना तख्ता बनाके के किसे वोट देना चाहिये यह मुक्करर कर सकता है। मिडियाने इस पर ज़ोर देना चाहिये। तभी वह गणतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने लायक होगा।
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मुद्दा                                                                      उम्मीदवार
                                                                       क्रमांक1    क्रमांक2
शैक्षणिक गुणवत्ता                                           0           1
निष्ठा                                                                   0               1
सांपत्तिक स्थिती                                             1               1
प्रत्याशी के बच्चे                                            1                1
स्वच्छतागृह                                                   1                0
भ्रष्टाचार                                                            0                1
नीति                                                                  0               0
वर्तन                                                                  1               0
समाजसेवा                                                       0               0
विकास की क्षमता                                          0               0
कुल गुण                                                           4            5
टिप्पणियाँ:
चुनाव के मुद्दे और गुण देने की पद्धत के बारे में नीचे सहायता दी है।
1.       जो भी उम्मीदवार (कोई राजनीति दल का हो या अपक्ष) चुनाव जीतता है वह जनता का प्रतिनिधी माना जाता है।
2.      चुनाव जीतने के लिये 100 प्रतिशत वोट मिलने का कोई बंधन नही है। बंधन सिर्फ बाकी कोई भी उम्मीदवारसे ज़ादा वोट मिले तो वह उम्मीदवार चुनाव में जीतता है। इस का मतलब यह है कि यदी 50 प्रतिशत वोटींग हुआ तो 15-20 प्रतिशत वोट पानेवाला उम्मीदवार भी जनता का प्रतिनिधी बन सकता है। इसलिये चुनाव में 100 प्रतिशत वोटरोंने हिस्सा लेना चाहिये। दूसरा एक निकष यह भी होना चाहिये कि, जीतनेवाले उम्मीदवार को कमसे कम 35 प्रतिशत का बंधन होना चाहिये। कोई भी परिक्षा में ऐसा बंधन होता है तो चुनाव में क्यों नही?
3.      हर वोटरने उम्मीदवार कैसा होना चाहिये उस के निकष बनाने चाहिये। मिडिया वोटर को निकष बनाने में मदद कर सकती है। उपर क ी तालिका में कुछ निकष दिये है। वह परिपूर्ण नही है। वह सिर्फ दिशा दर्शक है।
4.     निकष की सूची बनाने के बाद उपर दी हुुई तालिका समझ के हरएक ने अपनी तालिका बनानी चाहिये। मिडिया इस में प्रभावी भूमिका निभा सकती है।
5.      निकष और राजनीति दल (या अपक्ष उम्मीदवार) के सेल में 0 (शून्य) या 1 (एक) गुण देना चाहिये। यदी राजनीति दल का उम्मीदवार (या अपक्ष उम्मीदवार) निकष में पूरी तरह सफ़ल है तो एक अन्यथा असफ़ल होता है तो शून्य गुण उस सेल में लिख दिजीये।
6.      हर सेल में गुण देने के बाद हर स्तंभ के कुल गुण आखरी पंक्ति में लिख दिजिये। इस पंक्ति में जो सबसे ज़ादा गुण पायेगा वह उम्मीदवार को वोटिंग करना वोटर के लिये उपयुक्त होगा।
7.     यदी सब के गुण बहोत कम हो तो कोई भी उम्मीदवार लायक नही है ऐसा निष्कर्ष सही होगा। ऐशी हालत में "कोई भी उम्मीदवार लायक नही" ऐशी नोंद वोटर कर सकता है। इस के लिये वर्तमान पद्धति क्लिष्ट (इस्तेमाल करने में बहुत दिक्कत) है। यह पद्धति आसान करनी चाहिये। वोटर का मताधिकार कायम रखना चाहिये। शासन अपनी तरफ़से सबसे उपर एक उम्मीदवार "नीचे के उम्मीदवारों में से कोई नही" जोड़ सकता है। यदी यह उम्मीदवार सबसे जादा वोट पाये तो चुनाव प्रक्रिया फिरसे चालू करनी चाहिये।
8.      शैक्षणिक गुणवत्ता के लिये कोई एक निकष मुक्करर करना कठीन है। कम से कम उम्मीदवार 9 वी पास होना चाहिये. यह निकष व्यवहारिक हो सकता है। राजनीति दल अपना उम्मीदवार चुनते समय इस पर ज़ादा ज़ोर दे तो अच्छा होगा।
9.      उम्मीदवार की निष्ठा यह बड़ा निकष होना चाहिये। ज़ादा से ज़ादा उम्मीदवार "टिकट दिया तो आपक़ा नही तो दूसरे दल का या अपक्ष" ऐशी भावना दिख़ाते है। इस के लिये कानून भी होना चाहिये। उम्मीदवार यदि कोई दल के तरफ़से चुनाव में उतर ना चाहता है तो उस दल का वह कम से कम छ (6) साल का निरंतर सदस्य होना चाहिये। इस का मतलब अर्जी दाख़िल करने समय उम्मीदवार निरंतर छ साल या तो राजनीति दल का सदस्य होना चाहिये या अपक्ष होना चाहिये। इस कानून में एक प्रावधान होना चाहिये। यदी कानून लागू होने के बाद चुनाव छ साल के पहले होता है तो काल मर्यादा छ साल के बजाय कानून लागू होने के दिनांक से अर्जी दाखिल करने तक की होनी चाहिये। ऐसा करनेसे राजनीति दल की बड़ी समस्या हल हो सकती है। यदी टिकट नही दिया तो वह व्यक्ती अपक्ष बन कर चुनाव नही लड़ सकेगा।
10.   राजनीति दल का या अपक्ष उम्मीदवार सधन होना कोई गैर बात नही। मगर ज़ब जनप्रतिनिधी बनने के बाद उस की साम्पत्तिक स्थिती गैर मार्गसे सुधर जाती है तो वह आपत्ती जनक है। ऐसे जनप्रतिनिधी जनता को कुछ लालच दिखा कर फिरसे चुनाव लड़ते है और गैर कानूनी तरकोंसे अपनी साम्पत्तिक स्तिथि बेहया सुधारते है। पहले दफ़े चुनाव लड़नेवाला उम्मीदवार 1 गुण पा सकता है।
11.   दो से जादा बच्चेवाला उम्मीदवार कुछ चुनाव में हिस्सा नही ले सकता। यह कानून सभी चुनावों के लिये लागू कर सकते है। उस में थोड़ा सुधार आवश्यक होगा। यदी अर्जी दाखिल करते समय निकष के हिसाबसे बच्चे हो और नौ महिने के अंदर संख्या में बढ़ोतरी होती है तो उस में आपत्ती नही होनी चाहिये। मगर अगले चुनाव में वह व्यक्ति उम्मीदवार नही बन सकती।
12.   स्वच्छतागृह यह आरोग्य के लिये ज़रूरी है। यह निकष हर चुनाव में होना चाहिये।
13.   भ्रष्टाचारी व्यक्ति जनता का प्रतिनिधी नही हो सकता।
14.  उम्मीदवार नीतिमान होना चाहिये, उसका आचरण शुद्ध होना चाहिये। उस के विरुद्ध चोरी, बलात्कार, हत्या जैसे मामले नही होने चाहिये। यदी वोटर सोचता है कि, ऐसे मामले सही है तो उस को शून्य गुण देने चाहिये।
15.  शासन में कोई भी पद के लिये भर्ती होती है तो उस में अनुभव का मुद्दा अहम होता है। चुनाव में 5 से 15 साल तक का समाजसेवा अनुभव अनिवार्य करना चाहिये।
16.   विकास करने की क्षमता यह एक अहम मुद्दा है। देश में बिजली, पानी,सड़क जैसी सुविधाओं की कमी है। भूत काल में देखा गया है कि, यह समस्या पिछले कई सालोंसे कायम है। राजनीति दल और अपक्ष उम्मीदवार, चुनाव के समय इस के बारे में जिकर करते है। मगर एक दफ़े चुनाव के नतीज़े जाहिर होने के बाद यह मुद्दा कचरा टोकरी में फेंका जाता है। बिज़ली की कमी है मगर फलाने क्षेत्र में अणुऊर्जाप्रकल्प नही होने देंगे। पानी की कमी है मगर फलाने क्षेत्र में बांध नही बनने देंगे। सड़क चाहिये मगर मेरे जमीन में नही बनाने दूँगा। इस का एक ही कारन है। स्वार्थ। फलाने क्षेत्र के वोट बटोरना या अपनी जमीन बचाना। शासनने भूमिअधिग्रहण कानून बनाया। मगर उसमें उस क्षेत्र में रहनेवाले जमीन मालिकों का हित कुछ हद तक ध्याम में लिया। जिन केपास जमीन नही उन का बिल्कुल ही ख्याल नही रख़ा। ऐसा कानून बनना चाहिये कि, सर्व जनताके लिये कुछ जनता त्याग करें और बाकी जनता त्यागी जनता का ख्याल रखें। यह कर सकते है। जनता को स्थलांतरित किये बिना विकास हो सकता है। उम्मीदवार और राजनीति दलोंने स्वार्थछोडना चाहिये। ऐसे स्थिति में मार्ग निकालना चाहिये। राजनिती दल और उम्मीदवार के पास यह क्षमता नही तो उन का नाम तालिकासे निकालना चाहिये।

यदी ऐसा कुछ हो जाता है तो भारत महासत्ता बनना दूर नही। जय हिंद।

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