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Saturday, 8 September 2012

भाजप का बचपन कब तक चलेगा?



भारत में मान्यता है कि, "लालयेत् पञतवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत। प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवत् आचरेत।" याने कि, पुत्र याने बेटा 16 साल का होने पर पिता का मित्र हो जाता है। आज़ कल के ज़माने में यह पुत्री याने बेटी के बारे में भी सच है। मैंने सुना था कि, जब सिनेस्टार मेहमूद छोटे थे तब इन्हे पिताजी का बेटा ऐसे पहचानते थे। 15-20 साल की उमर में उन्होने अपनी पहचान बनाई। उस के बाद लोग उन के पिताजी को मेहमूद के पिताजी ऐशी पहचान प्राप्त हुई।

हम हमेशा पश्चिम के तरफ देख़ते है। युरोप अमरिका में बच्चे ज़ब 16 साल के होते है तब अपना रास्ता खुद तय करते है और माँ-बाप की मदत के बिना आगे बढ़ते है। लड़कियाँ भी उस में पीछे नही रहती। इस में एक बात है जो लडकियों को अकेले रास्ता तय करने में मदत करती है। लड़का शादी करने के लिये कुमारी लडकी नही ढूँडता। इसलिये लड़कियाँ कुमारी रहने में गर्व महसूस नही करती। कहने का मतलब यह है कि कोई आदमी हो या संगठन अपनी पहचान बनाते है। आदमी के लिये 16 की उम्र माने रखती है। संगठन के लिये जादा होगी। मगर कोई ना कोई उमर में संगठनने भी अपनी पहचान बनानी चाहिये। मगर भाजप (भारतीय जनता पक्ष) 60 साल के बाद भी रास्वसं (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) की उंगली नही छोड़ रहा है। भाजपने शुरुआत तो अलग रास्ता ढूँढनेसे की मगर समय के साथ दूसरे पक्ष के रास्तेपर चलना शूरु किया। अब तो भाजप भी दूसरे पक्ष से अलग नही रहा। रास्वसं की उंगली अभी भी पकड के रखी है। मेरे विचारसे यदी भाजप या कोई भी पक्ष नीचे दिये रास्ते पर चलना चाहे तो इससे भारत में अच्छा बदलाव आ सकता है। राजनीति पक्ष के लिये मेरे सुझाव नीचे दिये है।
राजनीति देश के हित में ही होनी चाहिये। देश का विकास यह प्रथम और आख़री लक्ष होना चाहिये। विकास सिर्फ भौतिक नही आध्यात्मिक भी ज़रुरी है। भारतवर्ष में आध्यात्मिक विकास की कोई कमी नही। पूर्वजोंने इसपर बहुत काम किया है। 
स्वामी विवेकानंद
स्वामी विवेकानंदजी कहते थे। पश्चिमसे भौतिक विकास की खुबियाँ सीख़ लो।मगर ऐसा नही सोचो कि हम पश्चिम को कुछ नही दे सकते। पूरे धरती पर आध्यात्मिक विकास में हमारी बराबरी करनेवाला कोई भी देश नही। पश्चिमसे भौतिक विकास लेते है तो हम आध्यात्मिक विकास दे सकते है। इस का मतलब पश्चिमसे हम कोई भीख़ नही ले रहे है। हर राजनीतिक पक्षने यह सीख़ना चाहिये। धर्म समाज के लिये निर्माण किया है। समाज़ के हर व्यक्ति का दुसरे व्यक्ति के साथ भाईचारा होना चाहिये। विवेकानंदजीने सिखाया है कि धर्म के दो अंग होते है। पहला वेदान्त और दूसरा स्मृति। वेदान्त शाश्वत और विश्वव्यापी है। मगर स्मृति स्थल, काल और समाज से प्रभावित है। उस का मतलब है कि इन तीनो में से कोई एक में बदलाव आ जाये तो स्मृति बदलती है। भारत में 12 मनु हो गये ऐसा मानते है। हर एक  मनुने अपनी स्मृति बनाई थी यह भी हम जानते है। इस का सीधा मतलब है कि, जिन्हे हम धर्म मानते है वे स्मृतियाँ है। इन स्मृतियों में स्थल, काल और समाज के हिसाबसे कोई बदलाव नही किया। इस लिये समाज में तनाव पैदा हो रहा है। इस स्थितीसे निपटाने के लिये भारत के आज के समाज के लिये स्मृति बनाने की आवश्यकता है। वैसे तो हर एक राष्ट्र एक समाज है और भारतने राज्यघटना बनाई है, वह उपलब्ध है। यह घटना ही हमारे लिये स्मृति होनी चाहिये। बाकि सर्व स्मृतियाँ आज़ की परिस्थिती में कालबाह्य हो गई है। सभी राजनीति पक्षोंने यह मान्य करना चाहिये। देश के नागरिकों में भाईचारा (आध्यात्मिक विकास) हो, तो भौतिक विकास आसान हो जायेगा। इस के लिये हमें याने सभी भारतीयोंने वेदान्त भूलना नही चाहिये। हमारी राज्यघटना धर्मनिरपेक्ष समाज मानती है। इस का मतलब कोई भी फ़ैसला लेते समय व्यक्ति तथाकथित कौनसे धर्म का है यह माने नही रखना चाहिये। हर व्यक्ति धर्मनिष्ठ होना चाहिये मगर धर्मांध नही होना चाहिये। यह तत्व राजनीति पक्षोंने भी ध्यान में रखकर अपनी यात्रा चालू रखनी चाहिये।
कोई भी राजनीति पक्ष के सदस्य उस पक्ष के आधारस्तंभ होते है। हर पक्ष के पास पूरे सदस्यों की सूची होनी चाहिये और वह किसी भी भारतीय को उपलब्ध होनी चाहिये। इंटरनेट के ज़रिये ऐसी सूची बना सकते है और वह सब को पक्ष की वेबसाईट पर उपलब्ध हो सकती है। सूची में क्या जानकारी होनी चाहिये यह हर पक्ष अपने हिसाबसे तय कर सकता है। मगर सभी के लिये एक ही पप्रत्र (फ़ार्म) हो तो जनता के लिये आसान होगा. सभी वर्तमान पक्ष जनता को विश्वास में ले कर यह प्रपत्र बना सकते है। मेरे ख्यालसे प्रपत्र में कम से कम आगे दी हुयी ज़ानकारी होनी चाहिये। नाम, पता, पिनकोड, जन्मस्थल पिनकोड, फोटो, बैंक अकाउंट, आधारकार्ड, मतदाता प्रमाणपत्र, सदस्यत्व शुल्क आदी की ज़ानकारी होनी चाहिये। किसी भी भारतीय व्यक्ती को वेबसाईटपर सदस्यत्व मिलना चाहिये। कोई इस का विस्तृत विवरण दे तो मैं आभारी रहूँगा।
भौतिक विकास के लिये भारतशासन के पास मंत्रालय है। हर मंत्रालय कोई ना कोई भौतिक विकास के लिये कार्यरत है। स्वातंत्र्य के तुरंत बाद "रोटी कपड़ा मकान" का नारा था। अब वह "बिज़ली सड़क पानी " बन गया है। इस का मतलब हम "रोटी कपड़ा मकान" के बारे में स्वयंपूर्ण हुये ऐसा नही है। मगर हमारी ज़रुरते अब बढ़ गई है ऐसा लेना चाहिये। "ज़रुरते अब बढ़ गई है " का मतलब हमारा विकास हुआ है। ज़ितना होना चाहिये उतना नही हुआ। मगर कुछ ना कुछ ज़रुर हुआ है। जिस गति (रफ़्तार) से होना चाहिये था वह गति हम पा न सके उस के कारण (वज़ह) है। सभी कारणों का ज़डसे विश्लेषण (छान बीन करना) होना चाहिये। उन पर काबू पाने के लिये उपाय ढूँढने चाहिये। उदाहरण के तौर पर रोकड़ व्यवहार लिज़िये। 90 फी सदीसे जादा रोकड़ व्यवहार बंद करने के लिये हर भारतीय के पास बैंक अकाउंट होना चाहिये। भारतीय रिज़र्व बैंकने सभी भारतीयों को शून्य शेष (बैलन्स) अकाउंट की सहुलियत प्रदान की है। अब कोई भी भारतीय बैंक में शून्य शेष अकाउंट खोल सकता है और शून्य शेष की वज़हसे उसे जुर्माना नही देना पडेगा। इस के साथ बैंक व्यवहार रोकड़ जैसा करने के लिये प्रणाली (व्यवस्था) बनानी पड़ेगी। ऐसी प्रणाली के बारे मेंइध़र पढ़ सकते है। दूसरा उदाहरण चुनाव का लिजिये। वर्तमान प्रणाली में चुनाव जीतने क्या, लड़ने के लिये भी पैसा और गुंड़े अपरिहार्य (बिल्कुल आवश्यक) है। अन्नाजी जैसा समाज़ सेवक भी चुनाव नही ज़ीत सकता। चुनाव प्रणाली में बदलाव भी अपरिहार्य है। थोड़ीजादा जानकारी इधर मिल सकती है। हजारो सालोंसे चलती आ रही जातिव्यवस्था भारत के विकास के लिये एक महत्वपूर्ण रोड़ा है। भारत में ज़ाति ऐशी चीज़ है जो जाती नही। कुछ जातियों के प्रगति के लिये आरक्षण का उपाय अज़मा रहे है। इस का फायदा होनेसे ज़ादा नुकसान ही हो रहा है। स्वामी विवेकानंदजीने उपाय सुझाया। उन का कहना था कि, शिक्षा ऐसी दवा है की जो ऐसे लोगों की उन्नती कर सकती है। मगर यह व्यवस्था मिटाने के लिये सिर्फ़ शिक्षा काफ़ी नही है। आरक्षण का इस्तेमाल कर सकते है। जाती की नोंद करना छोड़ सकते है। कैसे?इधर पढ़िये। अब तक समझा जाता था कि, भारत देहातों का देश है। मगर अब़ तस्वीर बदल रही है। करीब 40 प्रतिशत (फ़ीसदी) लोग शहरों में रहते है। कुछ राज्यों में यह प्रमाण (प्रतिशतता) 50 प्रतिशत या उससे भी ज़ादा है। अब पुराना तरीका याने शहर का परिघ बढानेसे दिक्कते बढेगी। नया तरीका सोचना पडेगा। शहर एक दूसरेसे जोड़ने का तरीका इधर देख़ सकते है। बहुत सारे उदाहरण दिये जा सकते है। अब सिर्फ़ एक ही उदाहरण दूँगाविकास के लिये ज़मीन बहुत माने रख़ती है। कोई भी ज़मीनधारक ज़मीन देना नही चाहता। उस के कारण भी है। ज़ादा जानकारी इधर मिलेगी। संक्षेप में सभी राजनिती पक्ष जनता के हर समस्या समझ ले और उस पर स्थायी (टिकाऊ) उपाय ढूँढ ले। चुनाव में एक दूसरे को नीचा दिखाने के बज़ाय अपना खुद का कार्यक्रम (योज़ना, मसुदा) जनता को समझा दे। जनता का शासन में सहभाग बढ़ा दे।
मेरे विचार (ख्याल) से हर पक्ष अपनी नीति इस तरहसे बदल दे तो भारत पूरी दुनिया में एक समर्थ और अव्वल राष्ट्र होगा। भाजप यदि काँग्रेस को नीचे दिखाना छोड़ दे, रास्वसं की उंगली छोड़ दे, अपनी नीति बना दे, और भारत की ज़नता की सेवा करे तो जनता को अच्छा विकल्प प्राप्त होगा। कोई भी यह रास्ता अपना के नया पक्ष स्थापन करना चाहता है तो वह भी जनता के लिये अच्छा होगा।
यह लेख़ पढ़ने वालों को बिनति: लेख़ में खामियाँ नजर आये तो अवश्य टिप्पणी द्वारा लेख के नीचे दर्ज़ करें। कम से कम व्याकरण और शुद्ध लेखनकी खामियाँ अवश्य दर्ज़ करे। लेख में जरुर सुधार कर दूँगा। जय हिंद।

1 comment:

Jana Hitwadi said...

नमो को मूरख़ बनाना इतना आसान है यह रास्वसं को पता नही था। मगर क्या नमो मूरख है? इस का पता चुनाव के बाद जो जंग चलेगी तब ही लगेगा। हो सकता है भाजप का बचपना और नही चलेगा।
मोदी शायद दिख़ते है उससे कई गुना धूर्त है। नमो को पता है। चुनाव जीतने के लिये रास्वसं आवश्यक है। मगर देश चलाने के लिये धर्मनिरपेक्ष के बिना दूसरा मार्ग नही। वर्तमान स्थिती में भारत के हर नागरिक का कर्तव्य है की नमो और भजप को तभी वोट दे जब वह धर्मनिरपेक्ष रहने की कसम खाये और कोर्ट में वैसा दस्त दर्ज करे।

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